कैसे करे रविवार के दिन
सूर्य कि उपासना ?
सूर्य सदैव मार्गी एवं उदित रहने वाला ग्रह है क्षितिज के कारण अथवा पृथ्वी के अपनी ही धुरी पर भ्रमण करते रहने के के कारण सूर्य कही उदित और कही अस्त दृष्टि गोचर होता है। सूर्य के अस्त और उदय होने का वास्तविक कारण तो पृथ्वी के अपने धुरी पर घूमने के कारण हो है जिस लिए दिन और रात्रि का विधान है।संक्रांति
सूर्य के एक राशि पर संक्रमण काल को ही संक्रांति कहते है सूर्य कि एक संक्रांति कि अवधि ३० दिनों कि होती है अर्थात एक माह तक सूर्य एक राशि में सचरण करता है इस प्रकार बारह माह में या एक वर्ष में सूर्य कि बारह संक्रांति सिद्ध होती है सूर्य कि मिथुन कन्या धनु तथा मीन राशि वाली संक्रांति को "षडशित्यायन ", मेष तथा तुला राशि वाली संक्रांतियों को "विषुव",वृष सिंह वृश्चिक तथा कुम्भ राशि वाली संक्रांतियों को "विष्णु पद "कर्क राशि कि संक्रांति को याम्यायन तथा मकर राशि कि संक्रांति को "सौम्यायन" संज्ञाए दी गयी है
सूर्य को समस्त जीवो की आत्मा ,समस्त ग्रहो का महा अधिष्ठाता तथा सर्व शक्तिमान कहा गया है।
आप्राधावा पृथ्वी अन्तरिक्ष गुं सूर्य आत्मा जगतस्त स्थूषश्च " कहे जाने वाले मूल भावना है ।
सम्पूर्ण ग्रहो में सूर्य -चंद्रमा को राजा कहते है चंद्रमा और सूर्य एक ही है। यदि उत्तरायण में होते है तो सात दोषो का हनन करते है ।
जिस जातक कि जन्म कुंडली में सूर्य चन्द्र बलवान हो कर बैठे होते है तो जातक सुखी सम्पत्तिवान होकर कुल का वर्धक होता है अर्थात कुल के नाम को आगे बढ़ाता है ।
सूर्य चन्द्र यदि निर्बल हो कर जातक कि कुंडली में विधमान हो तो कमजोर हृदय, हड्डी, शारीरिक -शक्ति, ललाट का तेज, आचरण, बौद्धिक विकास, धन, वैभव, धर्म- कर्म आदि में अवरोध उत्पन्न होता है।
पेट से संबंधित रोग , अजीर्ण ,भगंदर ,मधुमेह ,ज्वार पीड़ा ,अपेंडिक्स ,सर दर्द नेत्र विकार,अतिसार ,रोग से ग्रस्त करता है। सूर्य प्रायः जातक के जीवन में वर्ष २० से २८ कि आयु में अपना शुभ अथवा अशुभ प्रभाव फल प्रदर्शित करता है ।
सूर्य कि महादशा कष्ट कारी सिद्ध हो कर जातक के लिए हानि पहुचाने का काम करती है ।
१- यदि सूर्य निर्बल हो कर लग्न भाव में स्थित हो तो स्त्री एवं संतान को कष्ट व पित्त -वात रोगी बनाने वाला होता है । २- यदि सूर्य द्वितीय भाव में स्थित हो तो नेत्र विकार ,धन नष्ट तथा नौकरी में बाधक होता है \३-यदि सूर्य तृतीय भाव में स्थित हो तो भाई बहन के लिए विशेष बड़े भाई के लिए कष्ट कारी होता है \४-यदि सूर्य चतुर्थ भाव में स्थित हो तो राजभंग योग बनता है जिससे जीवकोपार्जन में क्षति होती है जातक चिंता ग्रस्त रहता है ५- यदि सूर्य पंचम भाव में हो तो जातक रोगी ,शीघ्र क्रोधित हो कर अपना अहित कर लेने वाला ,दुखी ,अल्प संतानो वाला होता है ६-यदि सूर्य षट्वे भाव में हो तो मामा को घोर कष्ट देने वाला होता है । ७-यदि सूर्य सप्तम भाव में हो तो राज्य दंड भोगता है ,स्त्री के साथ क्लेश ,स्वास्थ को लेकर मारकेश बनता है ८-यदि सूर्य अष्टम भाव में हो तो जातक दुखी ,पित्त रोगी बुद्धि हीं हो जाता है । ९-यदि सूर्य नवम भाव में हो तो भाग्य की हानि होती है धर्म का विरोध करने वाला नास्तिक होता है । और भाग्य भी उसका साथ नहीं देता है । १०-यदि सूर्य दसम भाव में हो तो पिता पक्ष कि हानि करने वाला पिता से विद्रोह करने वाला कर्म से हीन हो कर विचरण करने वाला होता है ११- यदि सूर्य एकादस भाव में हो तो आय के अनेको श्रोत बनते है स्थायी आय का साधन नहीं होता है और संतान को लेकर चिंतित रहेगा १२-यदि सूर्य द्वादस भाव में है तो दाहिने नेत्र में विकार होगा और अलसी प्रवित्त का होगा,पैतृक सम्पत्ति को नष्ट करने वाला होगा \
सूर्य पीड़ा निवारण के लिए
(क)- प्रत्येक दिन विशेष कर रवि वार के दिन सूर्य को हल्दी दूर्वा चंदन गौ दूध मिश्रित अर्घ दे ।(ख)-माणिक्य का दान करे । ३ रत्ती का माणिक्य और ५ रत्ती स्वर्ण कि अंगूठी में बनवाए। पंचोपचार पूजन कर दान करे ।
(ग)- सूर्य के वैदिक मन्त्र का जाप अनुष्ठान विद्वानो द्वारा सम्पन्न करवाये ।
(घ)-उपरोक्त उपयो के कर पाने के अक्षम स्थति में रविवार का व्रत धरन करे और आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करे ।
