Saturday, 15 February 2014

ग्रह क्या है ?

                 ग्रह क्या है ?

रात्रि के समय आकाश मंडल में करोडो ज्योति पिण्ड चमकते हुए दिखायी देते है| इनमे से कुछ सचल तथा कुछ अचल होते है| जो ज्योति पिण्ड अपने स्थान पर प्रायः बने रहते है, उन्हें तारा सितारा अथवा स्टार कहते है| परन्तु जो तारापिण्ड पूर्वाभिमुख हो कर, विभिन्न नक्षत्र पुञ्जों में भ्रमण करते हुए सूर्य कि निरंतर परिक्रमा करते रहते है,उन्हें ग्रह सितारा अथवा प्लेनेट्स कहा जाता है|
सौर मंडल में ग्रह-नक्षत्र कि उपस्थिति के सम्बन्ध में आधुनिक वैज्ञानिको का मत है कि आज से ३ अरब वर्ष पूर्व अनंत शून्य आकाश मंडल में एक प्रचण्ड सूर्य था| कुछ समय पश्चात एक दूसरा प्रचण्ड सूर्य किसी अज्ञात स्थान से भ्रमण करते हुए वर्त्तमान दिखाई देने वाले सूर्य के अत्यंत समीप से निकल गया| उक्त प्रचंड सूर्य के आकर्षण अथवा किसी कोने के टकराव से वर्त्तमान सूर्य के अग्निमय वातावरण में एक प्रचण्ड तूफ़ान जैसा आ गया, जिसके प्रभाव से वर्त्तमान सूर्य के कई प्रकाश पिण्ड अलग हो कर इधर उधर बिखर गए| बाद में यही प्रकाशवान पिण्ड ग्रह में परिवर्तित हो कर वर्त्तमान सूर्य के परिक्रमा करने लगे| पृथ्वी भी अन्य ग्रहो कि भाँति ही एक ग्रह है और सूर्य की परिक्रमा लगाती रहती है|
भारतीय ज्योतिष के मतानुसार समस्त बृह्माण्ड,जो जैसा दिखाई देता है ठीक उसी प्रकार उत्पन्न हुवा है|
ब्रह्मपुराण में लिखा है :
"चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा सवर्ण प्रथमेअवनि ।
शुक्ल पक्ष समग्रंतत तदा सूर्योदये सति ॥
प्रवर्तया मास तदा कालस्य गणनामपि| 
गहनना गानृ तू न् मासान वत्सारांवत्साधिपात||" 
चैत्र शुक्ल पक्ष कि प्रतिपदा रविवार के दिन प्रातः सूर्योदय के समय अश्वनी नक्षत्र तथा मेष राशि के उदय काल में सभी ग्रह थे ,उसी समय ब्रह्मा ने सृष्टि कि रचना की तथा उसी समय से सभी ग्रहों ने अपनी कक्षा में भ्रमण करना प्रारम्भ कर दिया विश्व के कार्यारम्भ के साथ ही दिन ,वार ,पक्ष ,मास,ऋतू ,अयन ,वर्ष ,युग मन्वन्तर का आ रम्भ हुवा| काल गणना का सूत्र पात भी यही से हुवा|
भारतीय ज्योतिष में सात ग्रहो को मान्यता प्राप्त है| शनि कि कक्षा सबसे ऊपर है| उसके नीचे बृहस्पत (गुरु )उसके नीचे मंगल उसके नीचे सूर्य उसके नीचे शुक्र उसके नीचे बुध उसके नीचे चंद्रमा की कक्षा है|\
राहु केतु मात्र छाया ग्रह कहे गये है|
इस प्रकार ग्रहो की संख्या कुल नव ग्रहो की हो जाती है|
पापी ग्रहो के प्रभाव से सौम्य गृह भी पापत्व को प्राप्त हो जाते है| इस प्रकार पापी ग्रह अशुभ फल और सौम्य ग्रह शुभ फल देने वाले सिद्ध होते है|
अधिक जानकारी के लिए आचार्य विमल त्रिपाठी जी से आप स्वयं संपर्क करे|
 ग्रह क्या है ?
रात्रि के समय आकाश मंडल में करोडो ज्योति पिण्ड चमकते हुए दिखायी देते है| इनमे से कुछ सचल तथा कुछ अचल होते है| जो ज्योति पिण्ड अपने  स्थान पर प्रायः बने रहते है, उन्हें तारा सितारा अथवा स्टार कहते है| परन्तु जो तारापिण्ड पूर्वाभिमुख हो कर, विभिन्न नक्षत्र पुञ्जों में भ्रमण करते हुए सूर्य कि निरंतर परिक्रमा करते रहते है,उन्हें ग्रह सितारा  अथवा प्लेनेट्स कहा जाता है|
सौर मंडल में ग्रह-नक्षत्र कि उपस्थिति के सम्बन्ध में आधुनिक वैज्ञानिको  का मत है कि आज से  ३ अरब वर्ष पूर्व अनंत शून्य आकाश मंडल में एक प्रचण्ड सूर्य था|  कुछ समय पश्चात एक दूसरा प्रचण्ड सूर्य किसी अज्ञात स्थान से भ्रमण करते हुए वर्त्तमान दिखाई देने वाले सूर्य  के अत्यंत समीप से निकल गया| उक्त प्रचंड सूर्य के आकर्षण अथवा किसी कोने के टकराव से वर्त्तमान सूर्य के अग्निमय  वातावरण में एक प्रचण्ड तूफ़ान जैसा आ गया, जिसके प्रभाव से वर्त्तमान सूर्य के कई प्रकाश पिण्ड अलग हो कर इधर उधर बिखर गए| बाद में यही प्रकाशवान पिण्ड ग्रह में परिवर्तित हो कर वर्त्तमान सूर्य के परिक्रमा करने लगे| पृथ्वी भी अन्य ग्रहो कि भाँति ही एक ग्रह है और सूर्य की परिक्रमा लगाती रहती है|
भारतीय ज्योतिष के मतानुसार समस्त बृह्माण्ड,जो जैसा दिखाई देता है ठीक उसी प्रकार उत्पन्न हुवा है|
ब्रह्मपुराण में लिखा है :
" चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा सवर्ण प्रथमेअवनि ।
शुक्ल पक्ष समग्रंतत तदा सूर्योदये सति ॥
प्रवर्तया मास तदा कालस्य गणनामपि|
गहनना गानृ तू न् मासान वत्सारांवत्साधिपात||
चैत्र शुक्ल पक्ष कि प्रतिपदा रविवार के दिन प्रातः सूर्योदय के समय अश्वनी नक्षत्र तथा मेष राशि के उदय काल  में सभी ग्रह थे  ,उसी समय ब्रह्मा ने सृष्टि कि रचना की तथा उसी समय से सभी ग्रहों ने अपनी कक्षा में भ्रमण करना प्रारम्भ कर दिया विश्व के कार्यारम्भ के साथ ही दिन ,वार ,पक्ष ,मास,ऋतू ,अयन ,वर्ष ,युग मन्वन्तर का आ रम्भ हुवा| काल गणना का सूत्र पात भी यही से हुवा|
भारतीय ज्योतिष में सात ग्रहो को मान्यता प्राप्त है| शनि कि कक्षा सबसे ऊपर है| उसके नीचे बृहस्पत (गुरु )उसके नीचे मंगल उसके नीचे सूर्य उसके नीचे शुक्र उसके नीचे बुध उसके नीचे चंद्रमा की कक्षा है|\
राहु केतु मात्र छाया ग्रह कहे गये है|
इस प्रकार ग्रहो की संख्या कुल नव ग्रहो की हो जाती है|
पापी ग्रहो के प्रभाव से सौम्य गृह भी पापत्व को प्राप्त हो जाते है| इस प्रकार पापी ग्रह अशुभ फल और सौम्य ग्रह शुभ फल देने वाले सिद्ध होते है|
अधिक जानकारी के लिए आचार्य विमल त्रिपाठी जी से आप स्वयं संपर्क करे|

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